पूरक और संपूरक में अंतर

पूरक और संपूरक में अंतर

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नमस्कार … अंतरकोश में आपका स्वागत है। आज हम इस आर्टिकल में पूरक और सम्पूरक में अंतर बताने जा रहे हैं। अक्सर आप इन दोनों शब्दों में कंफ्यूज रहते होंगे। समझ में नहीं आता होगा कि कहाँ पूरक का प्रयोग करें और कहाँ सम्पूरक का? पूरक का अर्थ है- कमी को पूरा करने वाला। सम्पूरक का अर्थ है – ठीक उसके जैसा। किन्तु ये अर्थ आपको कहीं भी मिल जाएगा फिर इस अंतरकोश पर आने का फायदा क्या? आइये इन्हें थोड़ा विस्तार से समझते हैं।

पूरक (Supplementary)-  पूरक और सम्पूरक दो वस्तुओं के लिए उपयोग किये जाने वाले सम्बन्ध हैं। पूरक का प्रयोग वहाँ किया जाता है जहाँ एक का महत्त्व अधिक होता है। आपको याद होगा परीक्षा के दौरान कुछ अतिरिक्त पेज माँगते थे अर्थात supplementary copy माँगते थे। ये पूरक कॉपी होती थी। यदि पूरक कॉपी खो जाए तो मुख्य कॉपी का महत्त्व कम नहीं होता। लेकिन यदि मुख्य कॉपी खो गई तो पूरक कॉपी का कोई महत्त्व नहीं रह जाता। इसे ही पूरक कहते हैं।

संपूरक (complementary) – जहाँ दोनों वस्तुओं का महत्त्व बराबर हो तो उसे संपूरक सम्बन्ध कहेंगे। जैसे तुम्हारे एक पैर का जूता खो जाने पर दूसरे जुते का औचित्य भी खत्म हो जाता है। अर्थात एक का अंत होने पर दूसरे का भी अंत हो जाता है। यही है सम्पूरक। 

इन दोनों शब्दों को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। जब हम दांपत्य जीवन में प्रवेश करते हैं तो  हमारा पूरा जीवन इन दो घटनाओं में समाप्त हो जाता है। हम चाहते हैं कि पूरा जीवन सम्पूरक हो अर्थात मेरे बिना वो अधूरी उसके बिना मैं अधूरा। लेकिन वास्तव में हमारा दांपत्य जीवन पूरक होता है और हम उसे जीवन भर सम्पूरक करने के लिए लड़ते रहते हैं। ये बदलेगा लेकिन तब जब बुढापा आ जायेगा। तब आप पूरक से सम्पूरक में दांपत्य जीवन जी पाएँगे।

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