पूरक और संपूरक में अंतर

इन दोनों शब्दों को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। जब हम दांपत्य जीवन में प्रवेश करते हैं तो  हमारा पूरा जीवन इन दो घटनाओं में समाप्त हो जाता है। हम चाहते हैं कि पूरा जीवन सम्पूरक हो अर्थात मेरे बिना वो अधूरी उसके बिना मैं अधूरा। लेकिन वास्तव में हमारा दांपत्य जीवन पूरक होता है और हम उसे जीवन भर सम्पूरक करने के लिए लड़ते रहते हैं। ये बदलेगा लेकिन तब जब बुढापा आ जायेगा। तब आप पूरक से सम्पूरक में दांपत्य जीवन जी पाएँगे।